गुरुवार, 17 अप्रैल 2014
रविवार, 1 दिसंबर 2013
बुधवार, 29 दिसंबर 2010
क्षणिका
उसने कहा साथ निभाएंगे,न जाने क्यूं चल दिए,
हम तकते रहे,सोचते रहे, जाने क्यूं चल दिए यूं
क्यूं लाड़ लड़ाया उन पलों को,जब यूं ही चले जाना था
आंखों से बहते आंसू ने पूछा थर्रथराते ओठों से
क्या हुई ख़ता तुझसे,जो चल दिए यूं मुंह मोड़ के
सांसों ने पूछा क्यूं रूक गई धड़कन,पूर्वी पवन के झोकें से
क्यूं बेखबर,बेजान किया,इस बेमरउवत पवन के झोकें ने।।
रविवार, 19 दिसंबर 2010
लम्हें
यादों की गलियारों से कुछ लम्हें
अकसर याद आते हैं
छोड़ जाते हैं ओठों पर हल्की सी मुस्कान
और गुदगुदा जाते हैं उन पलों को।
और कुछ दे जाते हैं आंखों में नमी
छेड़ जाते हैं तार दर्द के वीणा की
झंकृत कर देते हृदय के लहरों को
रस लहरी निकल पड़ती है आंखों के कोरों से।
और कुछ लम्हें यूं ही अकसर याद आते हैं
कोहरें से लिपटी चादर हो जैसी,कुछ अनकही सी
कुछ अनसुनी सी,कुछ अनदिखी सी।
बुधवार, 8 सितंबर 2010
चाहत
काफी अंतराल के बाद आज फिर आपकी ख़िदमत में उपस्थित हुई हूं चंद पंक्तियों के साथ इस उम्मीद से कि मुझे आपसे पहले जैसा ही प्यार एवं आशिर्वाद मिलेगा। स्वयं की बिमारी से जूझती हुई पर आप से ज्यादा दिन दूर नहीं रह सकती।
चाहत
जीने की चाह में इतने मशरूफ़ हुए कि
जी रहे हैं हम।
सोचा तो लगा कि कहां जी रहे हैं हम
दिन गिन रहे हैं हम।
उम्मीद है कि दामन छोड़ती ही नहीं कि
जी रहे हैं हम।
जीने की चाह ने आज इस मुकाम पे ला छोड़ा कि
एक तरफ जीने की उम्मीद और एक तरफ
नाउम्मीदी ने रखा है दामन थाम, इस कशमोकश में हैं कि
जाए तो कहां जाए हम।
इस तड़प ने फिर जला दी शमां चाहत जीने की
और फिर से जी रहे हैं हम।।
मंगलवार, 10 अगस्त 2010
सैलाब
सैलाब बहा ले गया अनगिनत ज़िन्दगियां
रह गई तबाहियों का भयावह मंजर
है कौन जिम्मेदार इन तबाहियों का।
कई सवाल कौंध उठते रह रहकर ज़हन में
सोचने को मजबूर कर देते हैं
कौन है ज़िम्मेदार इसका।
इन हरी-भरी वादियों में घूमती थी परियां
अठखेलियां करती थी फूलों डालियां।
गाती थी हवाओं के संग राग-रागगिनी
छेड़ देती मधुर संगीत की धून लहरे
अलहड़ नदी की उन्मत्त ताल पर।
स्वर्गिक चित्रकारी खुदरत की
क्यूं बरपा गई कहर बन सैलाब का
दे गई न भूल पाने वाले जख्म।
हम यूं तकते रहे, कर न सके सामना
विवश,लाचार मूक दर्शक बन बस देखते रहे
तांडव मृत्यु के रौद्र,क्रूर,भयावह रूप का।
हां,हम है जिम्मेदार इस रूद्र तांडव का
विकास की अंधी दौड़ में छूट गई
हमारी जिम्मेदारियां इसके संरक्षण की।
जलती रह गई धरती हम रह गए मस्ती में
अनदेखा कर गए,खुद की कब्र खोदने में हो गए
मशरूफ इतने कि जान ही न सके।
कब पैरों तले सरक गई ज़मी और
हम देखते रह गए तबाहियों का मंजर
अब भी वक्त रहते संभल जाए
वरना मिट जाएगा नामोनिशान।
इस धरा का, हाथ मलते रह जाएगे
बहा ले जाएगा सैलाब न जाने कितनी ज़िन्दगियां