बुधवार, 29 दिसम्बर 2010

क्षणिका

उसने कहा साथ निभाएंगे,न जाने क्यूं चल दिए,

हम तकते रहे,सोचते रहे, जाने क्यूं चल दिए यूं

क्यूं लाड़ लड़ाया उन पलों को,जब यूं ही चले जाना था

आंखों से बहते आंसू ने पूछा थर्रथराते ओठों से

क्या हुई ख़ता तुझसे,जो चल दिए यूं मुंह मोड़ के

सांसों ने पूछा क्यूं रूक गई धड़कन,पूर्वी पवन के झोकें से

क्यूं बेखबर,बेजान किया,इस बेमरउवत पवन के झोकें ने।।

रविवार, 19 दिसम्बर 2010

लम्हें


यादों की गलियारों से कुछ लम्हें

अकसर याद आते हैं

छोड़ जाते हैं ओठों पर हल्की सी मुस्कान

और गुदगुदा जाते हैं उन पलों को।

और कुछ दे जाते हैं आंखों में नमी

छेड़ जाते हैं तार दर्द के वीणा की

झंकृत कर देते हृदय के लहरों को

रस लहरी निकल पड़ती है आंखों के कोरों से।

और कुछ लम्हें यूं ही अकसर याद आते हैं

कोहरें से लिपटी चादर हो जैसी,कुछ अनकही सी

कुछ अनसुनी सी,कुछ अनदिखी सी।

बुधवार, 8 सितम्बर 2010

चाहत

काफी अंतराल के बाद आज फिर आपकी ख़िदमत में उपस्थित हुई हूं चंद पंक्तियों के साथ इस उम्मीद से कि मुझे आपसे पहले जैसा ही प्यार एवं आशिर्वाद मिलेगा। स्वयं की बिमारी से जूझती हुई पर आप से ज्यादा दिन दूर नहीं रह सकती।

चाहत


जीने की चाह में इतने मशरूफ़ हुए कि

जी रहे हैं हम।


सोचा तो लगा कि कहां जी रहे हैं हम

दिन गिन रहे हैं हम।


उम्मीद है कि दामन छोड़ती ही नहीं कि

जी रहे हैं हम।


जीने की चाह ने आज इस मुकाम पे ला छोड़ा कि

एक तरफ जीने की उम्मीद और एक तरफ

नाउम्मीदी ने रखा है दामन थाम, इस कशमोकश में हैं कि

जाए तो कहां जाए हम।


इस तड़प ने फिर जला दी शमां चाहत जीने की

और फिर से जी रहे हैं हम।।

रविवार, 15 अगस्त 2010




आप सभी को


स्वाधीनता दिवस

के शुभ अवसर पर

हार्दिक बधाई।

मंगलवार, 10 अगस्त 2010

सैलाब



सैलाब बहा ले गया अनगिनत ज़िन्दगियां

रह गई तबाहियों का भयावह मंजर

है कौन जिम्मेदार इन तबाहियों का।


कई सवाल कौंध उठते रह रहकर ज़हन में

सोचने को मजबूर कर देते हैं

कौन है ज़िम्मेदार इसका।


इन हरी-भरी वादियों में घूमती थी परियां

अठखेलियां करती थी फूलों डालियां।


गाती थी हवाओं के संग राग-रागगिनी

छेड़ देती मधुर संगीत की धून लहरे

अलहड़ नदी की उन्मत्त ताल पर।


स्वर्गिक चित्रकारी खुदरत की

क्यूं बरपा गई कहर बन सैलाब का

दे गई न भूल पाने वाले जख्म।


हम यूं तकते रहे, कर न सके सामना

विवश,लाचार मूक दर्शक बन बस देखते रहे

तांडव मृत्यु के रौद्र,क्रूर,भयावह रूप का।


हां,हम है जिम्मेदार इस रूद्र तांडव का

विकास की अंधी दौड़ में छूट गई

हमारी जिम्मेदारियां इसके संरक्षण की।


जलती रह गई धरती हम रह गए मस्ती में

अनदेखा कर गए,खुद की कब्र खोदने में हो गए

मशरूफ इतने कि जान ही न सके।


कब पैरों तले सरक गई ज़मी और

हम देखते रह गए तबाहियों का मंजर

अब भी वक्त रहते संभल जाए

वरना मिट जाएगा नामोनिशान।


इस धरा का, हाथ मलते रह जाएगे

बहा ले जाएगा सैलाब न जाने कितनी ज़िन्दगियां

छोड़ जाएगा अनगिनत कई सवाल अस्तित्व पर।

बुधवार, 4 अगस्त 2010

सुख



सुख क्या है

क्षणिक अनुभूति

आनंद

राहत

सफलता

पूर्णता

खूशी

शान्ति या फिर

पूर्णता का इनाम

या फिर

चाह की पूर्ति

आकांक्षा की तृप्ति

या फिर

महत्वकांक्षा पर विजय

इच्छाओं का शमन

या फिर

दुख की पहचान ही

सुख है।

सोमवार, 19 जुलाई 2010

मुझको प्यार है तुमसे




ऐ ज़िन्दगी मुझको प्यार है तुमसे
पल पल बीतती ज़िन्दगी,
हर पल नित नूतन रूप दिखाती
खटे-मीठे अनुभव दे जाती
अपने - पराएं का बोध कराती।



रूकना ,चलना, गिरना
फिर उठ कर चलना सिखलाती
रात-दिन, फिर रात के बाद
दिन का आनंद दिलाती ।



जीवन पथ के टेढे़-मेढे,पथरीले,
कंटक भरी राहों से गुजर कर
मंजिल तक पहुंचना, सबक़ सिखलाती।



रहगुज़र में रहबर बन जाती है
बिछा देती फूलों को कदमों तले
फिर लगा लेती गले
ऐ ज़िन्दगी मुझको प्यार है तुमसे।



मौत से प्यार करना सिखलाती
तू कितनी ज़िन्दादिल है ज़िन्दगी
इश्क से खुदा को मिलाती है ज़िन्दगी
ऐ ज़िन्दगी, हां मुझको प्यार है तुमसे।