गुरुवार, 7 जनवरी 2010

क्षणिकाएं

आँसू भरी निगाहों से अभी विदा कर आये हैं,
अपने मासूम अरमानों को अभी दफ़ना कर आये हैं,
सोचा था ज़िन्दगी को जिएंगे हम, पर,
जी न सके,अपने को ही जिंदा जला आए हैं हम।
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ज़िन्दगी भी इस कदर खुशनसीब होती है,
जहां हम होते हैं, ज़िन्दगी भी वहीं होती है।
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इस कदर ज़िन्दगी में खोये थे हम,
आँख खुली तो जाना,ज़िन्दगी क्या है।

9 टिप्‍पणियां:

  1. इस कदर ज़िन्दगी में खोये थे हम,
    आँख खुली तो जाना,ज़िन्दगी क्या है।
    अच्छी अभिव्यक्ति।

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  2. बहुत सुंदर और उत्तम भाव लिए हुए.... खूबसूरत रचना......

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  3. AAp me likhne ka ek alag aur bahut sundar style hai. Aapki yeh rachna bahut aachi lagi.Badhai.

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  4. आप सभी का धन्यवाद,इसी तरह हमारा मार्गदर्शन करते रहें।

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  5. इस कदर ज़िन्दगी में खोये थे हम,
    आँख खुली तो जाना,ज़िन्दगी क्या है।

    -बहुत खूब बात कही!! बधाई.,

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  6. तीनों क्षणिकाओं में अलग-अलग और सुंदर भाव - और कोशिश करें - शुभकामनाएं नव वर्ष २०१० की मंगल कामना के साथ.

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  7. सोचा था ज़िन्दगी को जिएंगे हम, पर,
    जी न सके,अपने को ही जिंदा जला आए हैं हम ..

    कमाल के शेर कहे हैं ........ खुद को जला कर ही कवि जन्म लेता है ........

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