शुक्रवार, 29 जनवरी 2010

फिर वो याद आए

आज फिर वो याद आए,
आहिस्ते से आना,
नजरें चुराना
बैठ जाना,
मुस्कुरा देना
और बगलें झांकना।
खामोश निगाहें बया करती़ हैं
अनगिनत अफसाने
फिर छेड़ देना बहस
आज के तरानों की
और डुब जाती है
चाय की चुश्कियों में।
फिर उठना
और चले जाना
रह जाते हैं
कई ऊलझे सवाल।
मैं जुट जाती हूं
सुलझाने में।

10 टिप्‍पणियां:

  1. उठता है मन में ख्रयाल
    कैसे सुलझे ये ऊलझे सवाल।
    मैं जुट जाती हूं चाय बनाने में
    क्या रखा है इन गुत्थियों के
    सुलझने-सुलझाने में।

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  2. इस कविता में प्रत्यक्ष अनुभव की बात की गई है, इसलिए सारे शब्द अर्थवान हो उठे हैं ।

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  3. हर शब्‍द में गहराई, बहुत ही बेहतरीन प्रस्‍तुति ।

    Sanjay kumar
    http://sanjaybhaskar.blogspot.com

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  4. आज फिर वो याद आए,
    ..........लाजवाब पंक्तियाँ ............

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  5. आज फिर वो याद आए,
    आहिस्ते से आना,
    नजरें चुराना
    बैठ जाना,
    मुस्कुरा देना
    और बगलें झांकना।
    Behad saral sundar alfaaz hain!

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  6. यादें अक्सर कुछ नये एहसास ले कर आती हैं ........... कब चाय शुरू होती है कब ख़त्म पता ही नही चलता ......... बहुत लाजवाब लिख है .......

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  7. आप सभी का बहुत-बहुत धन्यवाद।

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  8. मैं जुट जाती हूं
    सुलझाने में।

    अगर सुलझ जाये त्तो कविता के मध्याम से बताए .

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