शनिवार, 20 फ़रवरी 2010

जीने दो

मेरा छोटा प्रयास यदि बाघ बचावो अभियान में योगदान दे सकता है तो मुझे हार्दिक प्रसन्नता होगी,क्योंकि यह हम सभी का कर्त्तब्य भी है कि इस धरा के सौन्दर्य को कभी न मिटाएं।

हम तुम
एक ही माल्लिक के बंदे
फिर क्यू हैं ये दुरियां
हमने तो नहीं बिगा़डा़
संतुलन इस धरा का
फिर क्यू नहीं
जीने देते हमें।
तुम हो विवेकशील पशु
हम हैं नृशंस पशु
बन बैठे धरा के नियंता
धन-लोलुपता की आड़ में
लूट लिए वनस्थलियां
बेघर कर डाला।
क्या हम चूं भी न करें
निकाल अपने खूनी पंजे
किया घात पर आघात
बन गए आदमखोर।
हम भी कभी थे
देश की आन, बान और शान
तुमने मिटाई हस्ती हमारी
हरितिम झिलमिल चादर को
किया तार-तार
शहंशा थे, हम
अपने जहां के
नृशंस पशु तुम
बन बैठे बाघखोर
कुछ ही तो
बचे हैं हम
बस भी करो
अब तो
जीने दो हमें।

6 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत अच्छी प्रस्तुति।
    इसे 20.02.10 की चिट्ठा चर्चा (सुबह ०६ बजे) में शामिल किया गया है।
    http://chitthacharcha.blogspot.com/

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  2. बहुत ही अच्छी कविता. या यह कहूँ की दिल के भाव दिल को छु गए तो गलत नहीं होगा. मेरी बधाई स्वीकार करे. इस अभियान में आपकी यह कविता एक सहरानीय कदम है. फर्क मात्र इतना है की आप अपनी भावनाओ को शब्दों में पिरो कर कविता लिखती है औरमैं उन्ही भावनाओ से गुफ्तगू करता हूँ. आपका भी मेरी गुफ्तगू में स्वागत है.
    www.gooftgu.blogspot.com

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  3. बहुत ही अच्छी रचना .. या याचना ... पर इंसान इतना स्वार्थी है की कुछ नही समझेगा .....
    काश मानव सब के साथ रहने की आदत डाले ....

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  4. आप सभी लोगों ने अपनी प्रतिक्रिया दी,धन्यवाद।

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