शुक्रवार, 19 मार्च 2010

चलते चलते

लक्ष्मण झूले पर
चलते चलते
लोगों और
मोटर साइकिलों
की आवाजाही
में
सलाम करते हुए
मुस्कुराकर
यूं चुप चाप
चले जाना
बन्दरों की
धमाचौकडी़
को निहारती
भागीरथी की
निर्मल
पावन
जीवनदायी जलधारा
में लुत्फ उठाते
युगल जोडे़
आज भी
दृश्य चलचित्र
की भांति
ज़हन में
कौंध उठते हैं।


7 टिप्‍पणियां:

  1. इस कविता में प्रत्यक्ष अनुभव की बात की गई है, इसलिए सारे शब्द अर्थवान हो उठे हैं ।

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  2. अंतर्मन के मंथन को व्यक्त करती रचना....

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  3. अच्छी रचना
    यहाँ अवश्य देखे http://kavikokas.blogspot.com

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  4. Is atukant kawita men bhee lay ki kamee naheen lagati
    जीवनदायी जलधारा
    में लुत्फ उठाते
    युगल जोडे़
    आज भी
    दृश्य चलचित्र
    की भांति
    ज़हन में
    कौंध उठते हैं।
    बीती यादों का पुनरागमन यूं ही हुआ करता है

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  5. आप सभी का बहुत-बहुत धन्यवाद। आपने मेरा मनोबल बढाया।

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  6. भागीरथी की
    निर्मल
    पावन
    जीवनदायी जलधारा
    में लुत्फ उठाते ..

    बीते पल का खूबसूरत चित्रण .... बहुत अच्छा लिखा है ...

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  7. दिगन्बर नासवाजी आपकी प्रतिक्रिया का इन्तजार रहता है,धन्यवाद आपकी की प्रतिक्रिया के लिए।

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