गुरुवार, 20 मई 2010

एक दिन का शागिर्द


वर्षों की हुई साध पूरी
मिला मुझे अनोखा शागिर्द।
कहा.. बना लो शागिर्द
मुझे उस्ताद।
सीखा दो चैटिंग टीप्स
बन जाऊं धुरन्धर
इस फील्ड का।
मैंने कहा एवोमत्स वत्स
इन्वाइट करो मित्र को।
शुरू करो फिंगर को
की बोर्ड पर नचाना।

प्रारंभ हुई चैटिंग
एक..दो..तीन बीते घण्टे कई ।
कहने लगा.. वाह उस्ताद

वाट ए इक्सपिरिअन्स
वन्डरफुल फीलिंग्स
वाट ए लवली थिंग्स।
मैंने कहा... हो गई दीक्षा
पूरी तुम्हारी,बन गए शहंशा।
पर वत्स और भी हैं फायदे इसके
मस्तिष्क को मिलती पुष्टी
मुख को मिलती विश्रांति
हृदय को मिलता शुकून
फिंगर को मिलता व्यायाम।
शागिर्द ने किया दण्डवत
नतमस्तक हो कहने लगा
बना दी लाइफ मेरी उस्ताद।

देना चाहता हूं दक्षिणा गुरूदेव
आज्ञा दे तो शुरू करूं
झट से उठ खड़े हुए उस्ताद
कह उठे न बन तू भष्मासूर
वरना हो जाऊंगा मैं चकमासूर

लो चला मैं अब
इन्ज्वाय कर लाइफ अपनी
बन गया तू एक दिन का शागिर्द ।


16 टिप्‍पणियां:

  1. इस कविता के गुरु-शिष्य रिलेशन यह सोचने पर मज़बूर करता है कि
    गुर गोविन्द दोऊ खड़े का के लागूं पाय
    बलिहारी गुरु आपकी गोविन्द दिओ दिखाए

    इसका आध्यात्मिक रहस्य है।
    बिम्बों सो तो ऐसा ही प्रतीत होता है।

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  2. एक और शागिर्द तैयार खड़ा है ... लीजिये संभालिये ...
    शुभकामनायों के लिए धन्यवाद !

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  3. शागिर्द का आभार स्वीकारिये गुरु जी

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  4. गुरु और शागिर्द...बहुत खूब..सुन्दर है.


    ________________________
    'शब्द-शिखर' पर ब्लागिंग का 'जलजला'..जरा सोचिये !!

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  5. बहुत से गहरे एहसास लिए है आपकी रचना ...

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  6. हा-हा-हा, बहुत बढ़िया आपने पूरी ट्रेनिंग ही कविता में दे डाली !

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  7. वर्षों की हुई साध पूरी
    मिला मुझे अनोखा शागिर्द।
    कहा.. बना लो शागिर्द
    मुझे उस्ताद।
    ...गुरु- शिष्य की आधुनिक सुन्दर प्रस्तुति ....

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