बुधवार, 7 अप्रैल 2010

नारी

नारी हूं मैं अबला नहीं
जो तुम कहते देवी
पूजते उसके चरणों को
शक्ति में है तुमसे भारी
जननी है तुम्हारी
क्यूं जलते शक्ति से उसके
तूमपे है वो भारी
सोच, घबराते
सौ बहाने निकालते
प्रताड़ना के
नारी को नारी से लडा़ते
देख तमाशा इतराते
कहते तू अबला है
तांडव करते पुरूषत्व का
सुन ऐ पुरूष अहंकार
में मत हो चूर
नारी है तुझ पे भारी
न जगा रणचंडी को
नस्तनाबूद कर देगी
तेरे अस्तित्व को
वंदन कर मां है तेरी
आमंत्रित कर श्री को
मंहकाएगी
तेरे जीवन
बगिया को
पूरक है तेरी
सृजन कर
खुशहाल समाज का
नई कोपले प्रस्फुटित हो
पल्लवित,पुष्पित हो
महके घर-आंगन।

11 टिप्‍पणियां:

  1. "Today I begin to understand what love must be, if it exists. . . .
    When we are parted, we each feel the lack of the other half of ourselves.
    We are incomplete like a book in two volumes of which the first has been lost.
    That is what I imagine love to be: incompleteness in absence".

    - Edmond de Goncourt and Jules de Goncourt

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  2. mr.manojiofs@rediffmail.com7 अप्रैल 2010 को 3:08 pm

    बहुत अच्छी रचना।

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  3. दिनेश जी एवं मनोज जी आपका धन्यवाद।

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  4. सुन्दर भावाभिव्यक्ति...बेहतरीन प्रस्तुति..बधाई.

    *********************
    "शब्द-शिखर" के एक साथ दो शतक पूरे !!

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  5. नारी शक्ति को समर्पित रचना .. अच्छे भाव लिए ... सुंदर रचना ..

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  6. आकांक्षा जी एवं नासवा जी आपका बहुत धन्यवाद ,जो आपने मेरे प्रयास को सराहा।

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  7. सारी रचनाये आपकी बहुत ही अच्छी है|

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  8. रचना अच्छी और सच्ची लगी - इतने सख्त अंदाज में ना कहकर "नस्तनाबूद कर देगी तेरे अस्तित्व को" सलीके से कहते तो भी उतनी ही प्रभावशाली रहती.

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  9. आप सभी का शुक्रिया, मेरे ब्लाग पर आकर कमेन्ट देने का।

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  10. सुंदर शब्दों के साथ.... बहुत सुंदर अभिव्यक्ति....

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