गुरुवार, 29 अप्रैल 2010

तू कहे तो

आसमां के चादर में जड़े सितारों सी
बसी तेरी सांसे, मेरी सांसों में ।
तू कहे तो ला दूं
झिलमिलाती चादर को
तेरे लिए।
झरनों की कल-कल निनाद
करती जल-तरंगों को
ला दूं तेरे लिए।
तू कहे तो ला दूं
ऊषा की रश्मि किरणों को
सजा दूं तेरे चेहरे को।
तू कहे तो ला दूं
उष्णता से शीतलता को
छू जाए तेरे बदन को।
ला दूं तेरे लिए
फूलों की रंगत
संवार दूं तेरे यौवन को।
तू कहे तो ला दूं
गुलमोहर के रक्ताभ पुष्पों को
लालिम कर दे तेरे होठों को।
तू कहे तो ला दूं
धरती के धानी आंचल को
ढक दे तेरे दामन को।।

11 टिप्‍पणियां:

  1. शीर्षक से ही भावनाओं की गहराई का एह्सास होता है।

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  2. आपकी यह कविता बहुत सुन्दर है ... रुमानियत भरी सुन्दर कविता के लिए बधाई !

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  3. आप सभी का बहुत धन्यवाद,जो आपने सराहा मेरे लेखन को।

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  4. बहुत ही लाजबाब पोस्ट
    आभार..............

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  5. aapke blog par bhraman kar sakoon mila.bahut achhi rachnayn padhne ko mili.apne chintan ko or gehrai dengi to racnatmkta ka kalatmkta se nata judega.aap me sambhawna saf dikhti hai.shabd sandhan evam anusandhan mangte hain.shbdon ka peechha karengi to bahut kuchh naya milega or vahan se aapki kavita yatra nav soupan payegi.aamen!

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  6. ओमजी आपका बहुत धन्यवाद तथा आपके मार्गदर्शन की मुझे सदैव प्रतीझा रहेगी।
    पी सिंह जी आपका धन्यवाद।

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  7. वाह.. सुंदर भावाभिव्यक्ति.. साधुवाद..

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  8. योगेन्द्र जी आपका बहुत धन्यवाद इतना सुन्दर कमेन्ट देने के लिए।

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